गजल

मिलन की वह पहली रात का क्या कहना
अजनवियों की मुलाक़ात का क्या कहना

तब एक पलंग पर दो अनजान मिले जब
घूंघट उठते हीं बनि जज्बात का क्या कहना

शर्म हया के घेरे में गूंगा बन बैठे तब दोनों
पहल टूटी जब सुरु हुई वह बात का क्या कहना

दो बदन के खुश्बू जब बनने लगी एक तन
सिलसिलों की वह सुरुवात का क्या कहना

दिन महीने वर्षों बीते बात लगती है कल की
मौत की दहलीज में आई इस याद का क्या कहना
११-११-२०१४

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