गजल

कीतने बहाए आँशु पर जज्बात को धोया न गया
हिचकियाँ रुक गई मगर आँखों से सोया न गया

फूल की तरह सम्हाला जिसे बोने लगे काँटे वही
सहते रहे पीड़ा उनसे पर हमसे काँटे बोया न गया

बन गए वो पत्थर जो हैं हमारे कलेजे के टुकड़े
अपनो ने ही चोट दिए पर उनके सामने रोया न गया

फुफकार के वो चले गए दूध पिलाया जिसे हमने
रिश्ता तोड़ चले वो अपने हमसे रिश्ता तोड़ा न गया

उंगली पकड़ कर चलते थे दिखाने लगे हमको उंगली
बदल गए वो सब रास्ते पर हमसे रास्ता मोड़ा न गया
१४-११-२०१४

Leave a Reply