आईने बेचने वाला

एक आईने बेचने वाला
गली से मेरी गुजर रहा था
मैं भी आँगन में बैठा
दामन अपना कुतर रहा था

रंग बिरंगे देख आईने
मन मेरा ललचा गया
मैं भी उठकर उसके
पाश गली में आ गया

बोला बाबूजी, आईने ले लो
ठीक ठीक लगाउँगा
आज साफ़ साफ़ तुम्हें
तुम्हारा प्रतिबिम्ब दिखाऊंगा

सोचा मेरै आईने में तो
कहीं कोई कमी नहीं
बस पलटता रहा जब तक
नजरों से नजरें मिली नहीं

जाने क्या हुआ मुझे
झांककर खुदकी आँखों में
घंटों तक बैठा रहा
लेकर आईना हाथों में

बिम्ब प्रतिबिम्ब दोनों
ओझल हो जाते हैं
जो बने राख का ढेर
वो भी मिट्टी मिल जाते है

कौन हूँ मैं और कब तक
विचार मन हिला गया
आईने बेचने वाला
मुझे आईना दिखा गया

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