मै सिपाही देश का

दूर तक फैली बर्फ
अधेड़ चांदनी रात
वो भी सिगड़ी संग बैठा
लिए बन्दूक हाथ

पलकों को बोझिल करे
कोहरे की बरसात
धूऐं से घुटता समां
बोतल भर पानी साथ

कारतूश भरी मैगजीन
हथगोलों की बरसात
सूखी सूखी सब्जी संग
सूखा सूखा भात

किटकिटाता बदन
और कांपते हाथ
बनी दुश्मन चांदनी
हवाएँ सर्द सौगात

नजरें हलचल चपल
पत्तों की आवाज
नींद से दबी आँखें
सो जाने को बेताब

घूमता बेटी का चेहरा
बना दुश्मन आज
बूढ़े माँ बाप जैसे
खड़े फैलाये हाथ

कुछ पल आये आँसू
जैसे देंगे उसे रुलाए
फिर सी कर होठों को
बन्दूक ली उठाय

द्रढ़ता से हुआ खड़ा
दुश्मन न जान पाय
मै सिपाही देश का
फिर होठ दिए मुस्काय

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