कारगिल का शेर

सरहद बुला रही हैं ,
मेरी कोख के ओ लाल।
रखना सदा ही दिल में ,
अपने देश का तू ख्याल ।।
तू जन्मा मेरी कोख से,
ये मुझको नाज हैं।
हाँ सच में तेरी ज़रूरत ,
हिन्द को आज हैं।।
ऐसा सपूत सच में,
नसीबों से ही मिलता।
वीरानीयों में फूल भी,
मुश्किल से ही खिलता।।
ले लू तेरी बलाएँ तुझपे कर दूँ जाँ निसार ।
सरहद बुला रही है मेरी कोख के ओ लाल।।
बाजूओं में तेरी तो,
शेरों का खून हैं।
देखूँ तुझे तो बस मेरे,
दिल को सुकून हैं।।
कोई भी शत्रु देश में,
बढ़ने नहीं पाए।
जंग मे तुझसे कोई,
बचने नहीं पाए।।
कर देना दुश्मनों का ऐसा तो बुरा हाल।
सरहद बुला रहीं है मेरी कोख के ओ लाल।।
ये जंग का मैदान ही,
अब तेरा घर होगा।
हर हिन्द के बेटे का मीत,
अब समर होगा।।
ये वादियाँ तेरे ग़म को,
हँसकर के सुनेगी ।
कठिनाइयों में तेरी,
सही राह चुनेगी।।
बन जाओ मेरे लाल शत्रु पे महाकाल।
सरहद बुला रही हैं मेरी कोख के ओ लाल।।
जंग की प्रचण्ड ये ,
हवाएँ जब होगी।
सचमुच में कई औरतें,
विधवाएँ तब होंगी।।
कितने ही लाडलों के,
सिर से साया उठेगा।
कितने ही शुरवीरों का तब,
भाग्य रूठेगा ।।
कितने ही लाडलों के ना होंगे धड पे भाल।
सरहद बुला रही है मेरी कोख के ओ लाल।।
इतने में सुन के माँ की बात,
लाल यूँ बोला।
स्वीकारों वंदना चरणों में,
शीश ये डोला।।
तू माता मेरी सच में,
देवी का रूप हैं।
साहस का पारावार मैय्या,
तुझमे खूब हैं।।
अब तो में बदल दूँगा मैय्या दुश्मनों की चाल।
सरहद पे देखो जा रहा तेरी कोख का ये लाल।
एक बात पूछनी है मैय्या ,
मुझको हुक्म दो ।
क्या होगा तेरा हाल,
जरा मुझको बता दो।।
ये बात मेरे जेहन में,
आकर अभी चुभी।
मान लो जंग में यदि,
मुझको गोली लगी।।
रोएगी तो नहीं तुझसे बस इतना सा है सवाल
सरहद पे देखो जा रहा तेरी कोख का ये लाल।
ये सुनके पोंछ आँसुओं को,
जरणी यूँ बोली।
जो छीने मुझसे लाल तुझे,
वो बनी नहीं गोली।।
उस माँ को भी ए लाल तुझसे,
इतना प्यार हैं।
तुझपर तो मेरे लाडले ,
रहमत अपार हैं।।
गुलजार मेरे खिलते रहना बरसों सालों साल
सरहद बुला रहीं हैं मेरी कोख के ओ लाल।।
हाँ बात एक सुनलें ,
तुझसे मैं कहती हूँ।
ये थाम ले बंदूक जो,
तुझको में देतीं हूँ।।
पैंसठ में इसने,
ज़ोरदार जलवा दिखाया।
तेरे पिता ने लाशों का,
अंबार लगाया।।
तू हैं उन्हीं का खून रखना इसे संभाल ।
सरहद बुला रही हैं मेरी कोख के ओ लाल।।
ऐ लाल मेरे दूध का,
कर्ज़ चुकाना।
दुशमन को अपने क़दमों पे,
लाकर के झुकाना ।।
ये कारगिल तेरा हैं,
अब रण ही दिखाना।
भारत की वीर भूमि का,
रुतबा बढ़ाना ।।
ना होगा तेरा जंग मे कोई भी बाँका बाल।
सरहद बुला रही हैं मेरी कोख के ओ लाल।।
कर वन्दना तब माँ की लाल,
रण में आ पहुँचा।
करने सफाया शत्रु का,
ये शेर का बच्चा।।
जय घोष माँ के लाल ने,
रण में लगाई।
चहूँओर वादियों में उसने,
नज़र दौड़ाई।।
कुछ शत्रु दिखे सामने ,
मन मचलनें लगा।
उस बलवीर की आँखों से
खून उतरने लगा।।
थाम के बंदूक वो,
ललकारनें लगा।
माता का कर्ज़ खून से,
उतारने लगा।।
चल रही तलवारें तीरें ,
और तोंप थी।
बन्दूक की आवाज़ मानो,
ख़ामोश थी।।
बिछने लगी शत्रुओं के
लाशों की ढेरी ।
वाह -वाह रे मेरे शेर तेरी
ग़ज़ब दिलेरी।।
फँस गए शैतान सारे ऐसा बिछाया जाल।
सरहद पे देखो झुंझ रहा देश का ये लाल।।
प्रचण्ड रण में काम आये,
वीर हज़ारों ।
लाशे बिछी हैं चारों तरफ़,
नज़र निहारों।।
इन गोलियों की गूँज ने
था खेल दिखाया।
गुलजार लूट गया,
जहाँ फूल खिलाया।।
शमसीर की खनक पे था मच रहा बवाल।
सरहद पे जंग जीत रहा देश का ये लाल।।
लहराने लगा हिन्द का,
विजय निशान आज।
था घायल मगर माँ की
आँखों का सरताज।।
दुआएँ उठी सदकें में
लाखों हाथ थे।
राम और रहीम मानो
उसके साथ थे।।
हाँ सच में माँ की दुआओं मे,
करामात थी।
बजने लगी शहनाई
मृदंग साथ-साथ थी।।
उठकर के लाल ने माँ को,
गलें लगाया।
सचमुच में शेर ने अतना,
फर्ज निभाया।।
“अनमोल”यूँ ही लिखते रहना छेड़ों सुर पे ताल।
सरहद बुला रही हैं मेरी कोख के ओ लाल।।
(दोस्तों कविता कैसी लगी अपना अमूल्य सुझाव दें यदि आपके पास इसका कोई उचित शीर्षक हो तो ज़रूर बताएँ। आपसे सदैव स्नेह की उम्मीद करता आपका अनुज”अनमोल”
मो•नं•9694231040 & 8955095189 )