जहाँ कहीं भी मेरे पग पड़ते थे

गाँव से दूर, पार इन उँची पहाड़ियों के
दूर-दूर तक जहाँ नदी-झरने नहीं
मेरे पूर्व ही है यहाँ उनकी खेती
भय-संदेह के पुष्प खिले हैं मन में

अब आगे पथ नहीं, केवल रेत ही रेत
कोई तनिक भी पद-चिन्ह नहीं
जाने कितनी दूरी पश्चात गांव हो कहीं
संभव है लौटना मेरा पुनः उसी खेत?

मरूभूमि में पथ स्वतः निर्माण होते रहा
जहाँ कहीं भी मेरे पग पड़ते थे
भूलकर कहा जा रहा हूँ कौन जाने
कौन जाने मेरी खेती का क्या हुआ

मन में अस्थिरता निःसंदेह निर्मित रहेगी
उस दिन यात्रा समाप्त, मुझे प्रतीत हुआ
लेकिन मैनें तो केवल प्रयत्न था किया
वो ठहरे थे जहाँ, मैं चला वहाँ से भी

– नीरज सारंग

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