जन्मांग में द्वादश राशियों में स्थित सूर्य का फल

मेष के सूर्य का फल

मेष सूर्य फल करहुं बखाना |शास्त्र सिद्ध कवि योधा जाना ||
उद्यत कार्य भ्रमण सुख भोगी |सबल अस्थि पित रक्तक रोगी ||

वृष के सूर्य

उत्तम वस्त्रा भूषण गंधा |पशुवाहन धन धान्य सुधंधा ||
वृष राशीगत सूर्य प्रभावा |शिवप्रकाश निज बुद्धि बतावा ||

मिथुन के सूर्य का फल

वाणी मधुर बुद्धियुत ग्यानी |शास्त्र निपुण विनयी विज्ञानी ||
नीति निपुण द्वै माता पावा |सुन्दर नम्र शुशील सुहावा ||

कर्क के सूर्य का फल

चंचल चित्त राजगुण युक्ता |मातु पिता रिपु निर्धन वक्ता ||
मदिरा प्रेम दिशा दिश ज्ञाना |अभिमानी धर्मात्मा जाना ||
उत्तम रूप पित्त कफ रोगी | पत्नी भाग्य हीन अति लोभी ||
कबहु धनी कबहूँ धनहीना |कर्क सूर्य का फल कहि दीना ||

सिंह राशि के सूर्य का फल

क्रोध परायण दृढ उत्साही |वीर भयानक धीर सिपाही ||
वन गिरि भ्रमण दुर्ग का राही |पर उपकार धर्म निर्वाही ||
शत्रु दमन मन शोक न चिंता |आमिष प्रिय तन तेज अनंता ||
सूर्य राशि कर सूर्य प्रभावा |सारावली विधान बतावा ||

कन्या के सूर्य का फल

नारी सद्रस शरीर सुहावा |लज्जा युत लिपि ज्ञाता गावा ||
दुर्बल मेधावी मृदुवानी |दीन वचन प्रिय पूर्ण विधानी ||
कन्या सूर्य प्रभाव बतावा |ज्योतिष वेद नेत्र बतलावा ||

तुला के सूर्य का फल

राजा से भयभीत कहावा |संगति हानि पराजित गावा ||
पापाचरण कलह प्रिय कारी |अन्य कार्य उद्यत उपकारी ||
सदा हीन धन से वह प्रानी |तुला सूर्य प्रभाव अज्ञानी ||
द्वेषी पर दारा का प्रेमी |मलिन ढीठ परदेशी नेमी ||

वृश्चिक के सूर्य का फल

कृपण कलह प्रेमी औ क्रोधी |मातु पिता गुरु बन्धु विरोधी |
रोके रुकै न युद्धक योधा |वृश्चिक सूर्य प्रभाव प्रबोधा ||
मिथ्यारंभ दंभ मद माना |दुष्ट भार्या पालक जाना ||
क्रुद्ध आचरण लोलुप कामी |मातु पिता रिपु परम गुमानी ||
शस्त्र अग्नि विष पीड़ित होई |वृश्चिक सूर्य राशि फल सोई ||

धनु के सूर्य का फल

धनु गत सूर्य प्रभाव अपारा |धनु युत नृप प्रिय प्रिय संसारा ||
देव ब्राह्मण भक्त कहावै |शस्त्र शास्त्र सब विद्या पावै ||
देह विशाल बहुत बलवाना |बन्धु परायण सुन्दर जाना ||
शांत चित्त पूजित सज्जन से |करै साधु सेवा वह मन से ||

मकर के सूर्य का फल

लोभी हीन चरित्री गावा |दारा लीन कुकर्म बढ़ावा ||
तृष्णा अधिक भीरु धनहीना |उत्सव हीन सदा अति दीना ||
भ्रमण शील निज जन उपकारी |अस्थिर प्रकृति विक्षोभ दुखारी ||
सर्वनाश स्वयमेव करंता |निंदक विप्र देव अरु संता ||

कुम्भ के सूर्य का फल

सज्जन निन्दित अति बलवाना |पर त्रिय लीन क्रोध युत जाना ||
चंचल मैत्री पालक होई |चुगुल मलिन शठ झूठा सोई ||
अन्न वस्त्र का पर सुख पावा |कुम्भ सूर्य फल शिव ने गावा ||

मीन के सूर्य का फल

सज्जन प्रिय परिजन उपकारक |विज्ञ वली वैरी संघारक ||
दारा सुख से पाव अनंदा |सुन्दर सुत सेवक शुभ बंदा ||
जय हित धन का नाश सो करई |सूर वीर का पथ अनुसरई ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9412224548

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