जिंदगी गुजार दी

किसी रोज़ मिलने हमसे वो जरूर आएगी,
जिसकी चाहत मैं हमने जिंदगी गुजार दी,
आती थी ख्वाबो मैं रोज़ वो बहुत सताती थी,
शायद उसको भी हम से मिलने की दरकरार थी
था खुद को भी मंजूर ये,मिलन को एक शाम दी
हुआ जो रूबरू उस दिन,खुद की सुध-बुध हार दी
जिसकी चाहत मैं हमने जिंदगी गुजार दी II १ II

न कर सका गुफ्तगू, न हाल-ऐ-ब्या हुआ
चाहकर भी पल भर के लिए न मिलना हुआ
वो गुजर गए बगल, बस मैं ताकता रह गया
खो बैठा होश अपने, चाहत जो उसपे वार दी
किसी रोज़ मिलने हमसे वो जरूर आएगी,
जिसकी चाहत मैं हमने जिंदगी गुजार दी II २ II

कर के गुस्ताखियाँ उस की बयानगी
चेहरे पे फिर भी मंद मंद मुस्कान थी
करेंगे कभी तो हम पे वो मेहरबानगी,
लब थे सिले हुए, फिर भी एक आस थी,
किसी रोज़ मिलने हमसे वो जरूर आएगी,
जिसकी चाहत मैं हमने जिंदगी गुजार दी II ३ II

न जाने फिर भी क्यों उनके लिए,
मेरे दिल में एक मीठी सी प्यास थी
मिलेगी एक न एक दिन मुझे मेरी जिंदगी,
बस इतनी सी मेरे दिल में उनकी प्यास थी
किसी रोज़ मिलने हमसे वो जरूर आएगी,
जिसकी चाहत मैं हमने जिंदगी गुजार दी II ४ II

2 Comments

  1. Anmol tiwari Anmol tiwari 11/11/2014
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/03/2015

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