बचपन की चाहत- एक बार फिर

बचपन की वो अठखेलियॉ आज भी याद आती हैं…
वो नासमझी शैतानियॉं आज भी हंसाती हैं…
ऐ खुदा अगर सच में देता है कुछ मांगने पर तू..
तो ‘लौटा दे मुझे मेरा वो बचपन’…..

वो दिन थे जब मिल जाता था प्यार शरारते करने पर भी..
गर आज नहीं मिलता प्यार सच्चा प्यार करने पर भी..
ए खुदा करदे मेरा ये भ्रम दूर दिलादे मुझे वो प्यार…
या फिर ‘लौटा दे मुझे मेरा वो बचपन’…..

वो बचपन की दोस्ती के भी क्या होते थे अटूट रिश्ते..
आज भी सभी दोस्त है मेरे दिल के फरिश्ते..
टूट जाती है आजकल दोस्ती कच्चे धागे की तरह..
नहीं आता समझ मुझे ऐसी दोस्ती का वसूल..
ऐ खुदा सिखा दे मुझे ये दोस्ती निभाना
या फिर ‘लौटा दे मुझे मेरा वो बचपन’…..

वो दिन थे जब किताबों का बोझ सहज ही उठा पाता था..
पर आज नहीं उठा पाता ये जिन्दगी का बोझ..
शायद खोया था जिस दिन बचपन भूल गया हू सब कुछ..
ऐ खुदा देदे मुझे कोई जिन्दगी जिने का जरिया
या फिर ‘लौटा दे मुझे मेरा वो बचपन….

बचपन की वो यादें आज भी याद आती है..
बचपन की वो ही यादें आज भी रूलाती हैं..
ए मेरे दोस्तो जब भी मांगो खुदा से मेरे लिए कुछ..
यही मांगना ‘हेमन्त को उसका बचपन लौटा दे’…

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जो बचपन कभी हुआ करता था अपना..
वो आज रह गया है केवल एक सपना..
काश कभी तो लौट आए वापस ये लम्हा..
इसी इन्तजार में बैठा हू मैं तन्हा तन्हा..
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– हेमन्त खेतान