मैं कविता से आग लगाता हूँ

मैं चारण हूँ चंडी वाला, चलता शोणित धारों पर,
मैं झूलता आया बचपन से झूला तलवारों पर,
खेला खेल सदा ही मैंने, बरछी तीर कटारों से,
झेला है हर वार शत्रु का नहीं डरता हथियारों से,
मुझमें बल है शंकर का बुद्धि है मेरी अम्बा की,
मैं वाणी का वरद पुत्र हूँ, आशीष मुझे जगदंबा की,
जहां कहीं भी गलत दिखे वहीं चारण बन अड़ जाता हूँ,
मुख्य नहीं है मरूँ या मारूँ पर मैं वहाँ लड़ जाता हूँ,
बलिदानों की बलिवेदी पर हरदम शीश झुकाता हूँ,
आग जलाती है सबको मैं कविता से आग लगाता हूँ,
पाखंडी और पाखंडो की मैं हर दिन होली जलाता हूँ,
आग जलाती है सबको मैं कविता से आग लगाता हूँ।।

मनोज चारण
मो. 9414582964

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  1. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 11/11/2014

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