ध्यान

छाते बारीश से बचाते हैं,
पर दिल के आसमां पे, जब बादल छाते हैं,
तब कोई नहीं बचाते !
सिवाय “ध्यान” के, जो मै “हो” सकता हूँ.

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर

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