राम शरण महर्जन की-हाइकु

हाइकु
******

ठोकर खाये
टकरा अपनो सें
नाता पराई |१|

एक ही छत
धुमिल है बन्धुत्व
खून खरावा |२ |

निश्छल प्यार
प्रभाती किरणें व
नहीं विभेद |३ |

अपनापन
होता मनके स्वर
जीवन ड़ोर |४|

थकता नहीं
दौड़ सुवः-शाम की
रिश्ते की धागी |५|

घर की खुसी
जीवनके मक़सद
अप्नोपे खोना |६|

प्यार लुटाना
धन्य होता जीवन
साथ निभाना |७|

घर बनता
मेंहनत सबका
बड़ी दिल सें |८|

कुछ भी नहीं
प्रसव पीड़ा आगे
ये स्वरगुल |९|

राम शरण महर्जन
कीर्तिपुर -१७, काठमांडू, नेपाल
११/११/२०१४

One Response

  1. Ram Sharan Maharjan राम शरण महर्जन 11/11/2014

Leave a Reply