मैं क्या गीत गाऊँ?

पंछी का घोंसला ही पिंजरा हो गया है
भाग्य-रेखा में क्या यहीं अंकित था?
हे सर्वश्रेष्ठ किसान!
तूने खेत-खलिहान, पर्वत, नदी, जलधि,
वायु, प्रकाश की खेती की थी
जिस सृष्टि में
वहाँ के खग अपने ही घरों में
बंदी हो गये हैं
आनंद के इस महासरोवर संसार में
तूने डुबकी लगाकर स्नान हेतु भेजा था
अज्ञानी, अंधकार, विपदा, वेदना का जल
उसमें घुल गया है
इस कारागार में बैठकर
मैं क्या गीत गाऊँ?
भक्ति, अंतःमुक्ति, संतुष्टि, स्वतंत्रता
किसके हेतु गीत गाऊँ?
मृत्यु! मुक्ति क्या तू ही है?
मेरे चले जाने से
क्या ये घोंसला उदास नहीं हो जायेगा?
हृदय में संदेह-भय भरा है
अपने प्रियतम-प्राण-पीर को
वह किससे कहे?
हे मातृभूमि! हे माँ! तुम्हें छोड़कर
चले जाने की चाह नहीं, चाह नहीं

– नीरज सारंग

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