कोरा कागज़

पत्र तुम्हारा मिल गया कोरा।
देख कर पढ़ा मैनें
और चूमा उसे।
कलेजे से लगाकर
रख दिया।।
अनकही थी जो बातें
वो सब खुल गई।
कालिमा मन में भरी थी
वो सब धूल गई।।
छेड़ दी सरगमें चाहत की
कितना लिखे कैसे लिखे।
शब्द थे कम
इसलिए तुमने तुम्हारे पत्र में
कुछ नहीं लिखकर भी
सब कुछ लिख दिया।।
और मैनें देखकर पढ़ा चुमा
और कलेजे से लगाकर रख दिया।।
बड़ा अजीब हैं तुम्हारे
कहने का ढंग
बिना शब्दों के भी
सब कुछ महसूस कर लिया मैनें।।

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