उम्दा हर्फ़ तकदीर का

उम्दा हर्फ़ तकदीर का
जिन्दगी की लकीर से,
यूँ गुजर गया कभी
जानता ही न हो।
रही जिन्दगी घूरती
उस हर्फ़ को लेकिन,
ज्यों रूह को जिस्म पर
ऐतबार ही न हो।
मायूस हो निगाह ने
मौन व्रत रख लिया,
जुबां खामोश,कान
गफ़लत में न हो।
फिर किसी राह कुछ
उड़ते परिन्दे मिल गए,
मालूम तुम्हें सुकून का
बोले-भइया कौन हो?
हम मंदिर के राम औ
उनके खुदा के पास थे,
पहले पहल डर गए
पूछा-क्या इंसान हो।
विरोध तर्जे-हठ लगे
फ़साद से क्या फैसला,
ऐ खुदा,नजदीक अब
चंद सुकूं की बात हो।

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