तेरे आँचल सा

फिर तेरे चूल्हे की
लिपटी राख याद आ गई
अपने हाथों से खिलाई
वो कोर माँ भा गई

मन करता है तेरी
गोद में बैठ जाऊं मैं
बस देखते तुझको
दौड़ कर लिपट जाऊं मैं

तेरी तरहां मेरा पशीना
कोई पौछ्ता नहीं आँचल से
माँ तेरी लोरी के बिन
नींद उड़ गई आँखों से

देखता था गले का ढोलना
जब बाल मेरी बनाती थी
पापा मुझे पीटते थे और
आँख तेरी भर आती थी

तेरे जैसा प्यार मुझे
कोई करता नहीं ज़माने में
कुछ आजमाकर सोचते है
कुछ सोचते गले लगाने में

तेरे खुशहाल आँचल सा
कुछ भी रेशमी नहीं
ना वो इन्द्रधनुष है
रातें में चांदनी नहीं

Leave a Reply