ना मैं

देखो एक अरसा
गुमनाम सा बीत गया
ना वो वक्त रहा
ना वो मीत रहा

कुछ किनारे बनने
लगे थे , ऐसा लगता था
रूबरू वो खड़े थे
मन बड़ा भयभीत रहा

दोराहों पर जिंदगी
चल चलकर थक गई
ना मैं कभी गलत हुआ
ना कभी ठीक रहा

दिल दिमांक शायद
मेल नहीं खाते कभी
ना मैं समझदार बना
ना मैं मधु मीत रहा

परिंदों की तरहां
देखता था खुला आसमां
ना पिंजरे में रहा
ना लोगों के बीच रहा

तकलीफदेह रही
मुस्कुराहटें मिलने की
ना मिलनसार बना
ना मैं ढीठ रहा

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