इश्क में गर जान की

इश्क में गर जान की
बाजी लगी तो क्या लगा,
उन्होंने लगा दीं मासूम की
गर्दनें किसके लिए?
न रवायत मुल्क की
न माँ का दामन ही बचा,
उछल रही थीं बाजुएं
क़ाफ़िर फर्दा के लिए।
मैं इक परिन्दा इश्क का
भटका इस जहान में,
बदल रही थीं आशिकां वो
कहकशां के लिए।
नाहक अपना वजूद ही
उनकी शय कुर्बान था,
हमने उठाई पालकी
खन्जर उठा किसके लिए?
निकलकर भी निकलता
न था मेरे आगोश से,
मुस्कुराया निकलकर
वीरान था किसके लिए?
ताल्लुक मगर उनसे मेरा
कुछ भी नहीं दोस्तो,
कर रहे ठंडा जिगर
उश्शाक तुम किसके लिए?
अबकी बार ‘मुकेश जी’
खरीदेंगे खन्जर ईद पर,
कत्ल हुई मासूम गर
हम शादमां किसके लिए?

शब्दार्थ-
1-रवायत/संस्क्रति
2-फर्दा/आने वाला कल
3-उश्शाक/प्रेमी समूह
4-शादमां/खुशी

Leave a Reply