तितली आई पंख पसार

तितली आई पंख पसार
करके सुहागिन ऋतु-श्रंगार,
उड़े पखेरु धड़का दिल
आ गए भंवरे बन कातिल।

रानी घूमो करो विहार
संग हमारे भी सत्कार,
हम हैं फूलों के माली
हाथ मिलाओ दो ताली।

तितली बोली नहीं-नहीं
संग तुम्हारे कभी नहीं,
पहले भाषा हित जोड़ो
जहर,काटना भी छोड़ो।

जानो तितली तुम जज्बात
दुश्मन आए करने घात,
कष्टनिवारण प्रव्रति हमारी
लगे लुभाने कर करतब।

सहमा तितली का श्रंगार
लगे बहकने वीणा तार,
अब बिल्कुल खामोश खड़ी थी
नहीं दुबारा नजर लड़ी थी।

आया भंवरे को स्नेह
उतरा आँखों आँसूलेप.
तुम जननी साहित्यश्रम
तोड़ रहा जग मिथ्या भ्रम।

हमने देखा प्रेम मगर
मधु के प्यालों भरा नगर,
तुम संभव उसकी देवी हो
शील सुलक्षण बेबी हो।

हुई दिशाएं फिर खामोश
चली हवाएं हो मदहोश,
नयन झुकाए थीं सब बात
टूटे भंवरे के जज्बात।

उड़ी गगन में फिर तितली
नीचे उतरी तो मचली,
पुनः भंवरे का प्रस्ताव
बोली तितली-‘शिष्टाचार’।

(पुत्री शालिनी शर्मा के लिए समर्पित)

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