शायरी

क्यों करती हो हमारी सलामती की दुआ,
दुआएँ तो जिंदा इंसान के लिए किया करते हैं,
चाहो तो दफ़ना दो मेरे जिस्म को,
वैसे भी तुम बिन हम रोज मरा करते हैं.

कहाँ ढूंढूं उन्हे ना वो मिलते हैं ना उनकी परच्छाइयाँ,
खुश हूँ उनके जाने के बाद दो नये दोस्त मिले गम और तनहाइयाँ.

उधर वो सुबह शाम नये आशिक़ की वफ़ादारी किया करतें हैं,
इधर गम-ए-जुदाई बर्दाश्त नहीं होता तो हम शायरी लिखा करते हैं.

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