ब्राह्मण

युगों-युगों से इस पावन धरा का,
लौहा जग में माना जाता हैं।
इंसानी जिस्म बना फौलाद,
ये त्याग दधिची से जाना जाता हैं।।
अवनी से अम्बर तक बस,
यहीं आभा फैली हैं।
बन मार्गदर्शक किया निर्माण,
यहीं गौतम की शैली हैं।।
जब बात समर की आ जाए,
तो सहसा नाम उभर आता हैं।
हर ब्राह्मण की।साँसों पर,
बस परशुराम बस जाता हैं।।
कवि कोविद की कलम सृजन का,
जो ज्ञान जगत मैं फैला हैं।
मत भूलो इसी ज्ञान को,
सिद्ध ब्राह्मणों ने तोला हैं।।
मलयज देह शीतल मन पर,
इन्द्रियों का पहरा हैं।
ब्रह्ममूर्ति मन शान्त चित्त
कान्तियुक्त यह चेहरा हैं।।
बलिदानों की वेदी पर,
जब गीत कोई बन जाता हैं।
माँ भारती के क कष्ट हरण को,
ब्राह्मण तत्पर हो जाता हैं।।
शस्त्र उठाए शास्त्र उठाए,
काल को पीछे धकेला हैं।
सिद्ध वरदानों से इतिहास रचाकर
पूजित ब्राह्मण अकेला हैं।।
यत्र तत्र सर्वत्र मंगलम्,
प्रियं वाक्यं निर्मल मन।
जय ब्रह्म जय शशि स्वरूपं
जयतु जय महामुनि चव्यन।।
पूजित रहे शोभित रहे,
यश की किरण फैलें चहँऔर।
हे देव ब्राह्मण नमन शत् शत्
वंदना की ना टूटे डोर।।

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