जाए तो कहां जाए

बिना सा हो सीने में, वो जाए तो कहा जाए
कीना सा हो जीने में, तो राहों में उखड़ जाए

मुसाफ़िर है ये तन मेरा, कहां जाए वतन मेरा
किया जितना भी है मैंने, गुलिस्तां ये जतन मेरा
मगर फिर भी किवाड़ो ने उजाडा तो उजड जाए
कीना सा हो जीने में, तो राहों में उखड़ जाए …..१

जलाए क्या, अगर कोई, लगी हो आग पानी में
वज़ा तो खिंच लाएगा रतन मेरा जवानी में
नहीं तो जिंदगानीने में, पछ़ाडा तो पिछ़ड जाए
कीना सा हो जीने में, तो राहों में उखड़ जाए …..२

भला होता भलाई में, बुरा होता बुराई बुराई में
करम जैसा हो, वो उसका, सिला होता तुलाई में
विदाई में जला कोई, जीला कोई, वो जड जाए
कीना सा हो जीने में, तो राहों में उखड़ जाए …..३

उतरता है जो सिने में, संवरता है वो रंगो में
लहू में वो समाता है, समाता है वो अंगो में
मगर फिर भी समां शाही, बिगडता है तो बिगड जाए
कीना सा हो जीने में, तो राहों में उखड़ जाए …..४

रचनाकार/कवि~ धीरजकुमार ताकसांडे
(९८५०८६३७२२)

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