उन्मुक्त आनंदित

मैं अक्सर ये
सोचता हूँ
जेहन को अपने
खरोंचता हूँ

मुद्द्त से कलुषित
रक्त रंजीत इस
धरा मुक्ति को
भोगता हूँ

अन्जान इंसान
प्राणों का दान
नर मुण्डों को
टटोलता हूँ

धर्म अधर्म
जाति प्रकोपित
ज्ञान को अपने
झंकझोरता हूँ

सासवत सत्य
प्रकाश पुँज
उस परमात्मा
से पूछता हूँ

उन्मुक्त आनंदित
रूह त्यागकर
क्यूँ देह मैं सबकी
चीरता हूँ

2 Comments

  1. Rinki Raut Rinki Raut 03/11/2014
    • rakesh kumar rakesh kumar 05/11/2014

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