अनमोल आबरू

मेरी लाखों करोडों में
हसीन है आरजू, अनमोल आबरू

नीला नीला आसमां हसीन मंजर
सतरंगी खयालो का खंजर
उतर तो आए दिल में ना कोई गुहार रहें
जान भी जाए अगर, ना कोई मलाल रहें

दर्पण में ना नज़र आए
शीशे से जो गुज़र जाए
यही तो चाहे जिगर, ना कोई बवाल रहें
जान भी जाए अगर, ना कोई मलाल रहें

ये जो गहरी अदा है अजब
अमृत भरी विदा है गजब
हरदम छाई रहे, ना कोई सवाल रहे
जान भी जाए अगर, ना कोई मलाल रहें

रचनाकार/कवि~डॉ. रविपाल भारशंकर
(९८९००५९५२१)

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