मेवाड के वीर

मेवाड के उन वीरों की,
हस्ती अभी भी बाकी हैं।
फिर से जन्मेगा प्रताप,
ये उम्मीद अभी भी बाकी हैं।।
मान बढाया जग मे जिसने,
उन वीरों की क्या बात करूँ।
क्या कुंभा क्या राणा सांगा,
चेतक की में साख भरूँ ।।
भूखे प्यासे फिरे वनो में,
वो वीर बड़े अभिमानी थे।
फिर से जन्मेगा प्रताप,
ये उम्मीद अभी भी बाकी हैं।।
जौहर की लपटों से खेली,
पद्मिनी सी नार यहाँ।
आन के ख़ातिर लड़े समर में,
सिसोदा सरदार जहाँ।।
क्या जयमल क्या फत्ता गौरा,
बादल की जवानी हैं।
फिर से जन्मेगा प्रताप,
ये उम्मीद अभी भी बाकी हैं।।
रण ख़ातिर सिर काट दे दियो,
हाडी माँ क्षत्राणी ने।
धर पुरुष को रूप समर में
रण कियो कर्मा रानी ने।।
अमर हो गये अमरसिहँ भी,
इस दानी भामाशाह की माटी में।
फिर से जन्मेगा प्रताप,
ये उम्मीद अभी भी बाकी हैं।।
अरे पन्ना का त्याग देखकर,
कर्णराज भी शरमाया होगा।
मीराकी भक्ति के आगे,
राधा का मन भी घबराया होगा।।
कैसे भूला सकता हूँ में,
कुँवारी कृष्णा भी अभिमानी हैं।
फिर से जन्मेगा प्रताप,
ये उम्मीद अभी भी बाकी हैं।।
चित्तौडी बुर्जा दिवेर समर,
हल्दी घाटी या देसूरी।
उदियापुर “अनमोल”रत्न,
चावंड भौम या कोल्यारी।।
गोगुन्दा से माण्डलगढ तक,
लम्बी एक कहानी हैं।
फिर से जन्मेगा प्रताप,
ये उम्मीद अभी भी बाकी हैं।।

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