दिल्ली में जाके मरते है लोग.!

चूल्लभर पाणी भरते है लोग
दिल्ली में जाके मरते है लोग
एक अदना सा ख्वाब देखते
और भला क्या करते है लोग

टिचर, साइंटिस्ट राष्ट्रपती बन जाते
राजनिती को सबसे उपर धरतेे है लोग

अपने बाप की जागीर समझकर
सरकारी खेतो में चरते है लोग

पहिचान नहीं सकते आप इन्हे
अनगिनत मुखौटो की परते है लोग

आवा-बावाओं के चक्कर में गीरकर
झरने की तरह झरते है लोग

लगता है की दे रहे है आपको
मगर आपही से सबकुछ हरते है लोग

“भगवान” को मानते है
पर उससे भी कहा डरते है लोग

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर
(९८९००५९५२१)

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