अगर जाग होती है ये जिंदगी

कोई जलाता नहीं अपना घर
मगर आग होती है ये जिंदगी
बुझाता है कोई मगर अपना दर
अगर जाग होती है ये जिंदगी

कोई तुड़ाता नहीं अपना सर
मगर पाग होती है ये जिंदगी
जुड़ाता है कोई मगर अपना शर
अगर बाग होती है ये जिंदगी

कोई त्यागता नहीं अपना कर
मगर त्याग होती है ये जिंदगी
स्वीकारता है कोई मगर अपना वर
अगर याग होती है ये जिंदगी

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर (९८९००५९५२१)

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