जिंदगी चलते चलते याह बन जाती है

मृग जल ला दो, दो बुंदीया; मुझे प्सास लग जाती है
जिंदगी चलते चलते याह बन जाती है

देख जमाना जिन राहों पर चलने से घबराता है
उन राहों पर हम निकले, चाहे इन राहों पर दम निकले
खुद हो गवाह तो एक गली भी, राह बन जाती है
जिंदगी चलते चलते याह बन जाती है

उल्फत की राहों में पग-पग शूल है
पग- पग कांटे हैं
लेकिन दीवानो ने जहाँ में फुल और फुल ही बाँटे है
ज़िद हो रवां तो एक सलि भी, शाह बन जाती है
जिंदगी चलते चलते याह बन जाती है

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर

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