खयाल पे खयाल ना कर

खयाल पे खयाल ना कर, खयाल परिंदा होते हैं
खुदी पे मर, गुनाह ना कर, गुनाह जिंदा होते हैं

ये कौन सा धुवाँ हैं, तेरे मेरे दरम्यान
सुनसान सा हुवाँ हैं, तेरे मेरे दरम्यान
किसी का घर, तबाह ना कर, तबाह इंसा  होते हैं

इस दुनियाँ में, कोई इनायत, बोझ नहीं होती
जिन्दगी में, फिर से मुहब्बत, रोज नहीं होती
सहीं मगर, पनाह ना कर, पनाह फंदा होते हैं

उम्र तो रजिंश हैं, वंजीश मामुली
तेरी मेरी बंदिश तो हैं, गैर मामुली
यकीन कर, मनाह ना कर, मनाह गंदा होते हैं

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर (९८९००५९५२१)

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