बिगड़ जाते जाते है

आते जाते चेहरों को हम अब पढ़ जाते है
बात बात पे न जाने वो क्यों अब लड़ जाते है

ये आशिकी आसान नहीं , जरा ऐतिहात बरतना
खुली छत पे कबूतर अक्शर बिगड़ जाते जाते है

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