कही और चले

ढूंढते फिरते है अपनी अपनी मंज़िले , निगहबानो के बीच
वक्त की धुंध के पार कही और चले

ये जो फूलों से भरा सेहर था हमारा
वो मिटटी में मिल कर खाद हुए कही और चले

ऐसे माहौल में अब दर लगता है
कुछ बातें हम भी सुन ले सुनाले कही और चले

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