लेकिन पथिक मैं था हो ही गया

उस नयी प्रभात को धुंधली आँखें मेरी
कोहरे से भरे पथ पर सहसा खुंली
मैंने दूर तक देखने का प्रयत्न किया
सुनसान, अज्ञात दूरी और झाड़ियाँ दिखीं
लेकिन पथिक मैं था हो ही गया

कभी पहाड़ियाँ आईं, पार करते गया
कभी नभ में खुले पंछी की तरह उड़ा
कभी किनारे खेतों में खिले फूल दिखते
उन्हें चुनने हेतु पथगामी कभी न ठहरता
अनिमंत्रित आषाढ़ के बादल भी बरसे

कितना अहंभावी है मेरे रथ का सारथी
गहन कानन या घने घन है विश्राम-विरोधी
मुझे बैठाये अपने संग लग्न लिये जाते हुए
जाने किस गन्तव्य स्थान की साध उसे लगी
सदैव लिये जाता, कितने सूर्यास्त भी हुए

जाने वह कौन परछाईं बैठी थी पथ-किनारे
उदासी-आशाओं की आँखें एकटक पसारे
ठहरकर उसके अंतःभाव को जानना चाहा
शायद वो ध्वनि दी, न मुड़ा, न देखा पीछे
सोचा, कहीं दिशा न भूले, न ध्यानहीन हुआ

– नीरज सारंग

Leave a Reply