थरथराती लौ

कल के बारे में क्या सोंचना
वो आने से रहा वापस
और आने वाली कल की
क्यों फिकर करूँ
पता नहीं मेरे नसीब में
वो कल है या नहीं
आज, जो अभी है
वही है मेरा
भोग करने के लिए भेजा है
कर रहा हूँ भोग
वो भोग सुखद हो वा दुखद
बस, चेष्टा करता हूँ
मेरे कर्म वा भोग से
दूसरों की हानि न हो
क्या माया, क्या मोह
अब सोचना क्या
जिन्दगीका तीसरा हिस्सा भी
गुजर चुका
बिना घी का दिया हूँ
ये थरथराती लौ
पता नहीं कब बुझ जाए।
०१-११-२०१४

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