न जाने कितने बेचारे

न जाने कितने बेचारे इस मैखाने में है
कितनी कशिश इस पैमाने में है

लब छूते पैमानों की हवस उतरती है जब सीने में
ऐसा लगता है किसी दवाखाने में है

ढूंढते रहते है इस दौर क्या क्या
भूल जाते है , वो दौर-ऐ -मोह्हबत बंद किसी तहखाने में है

पूछते रहते है सभी कौन हुआ करते थे वो तुम्हारे
चुप ही रहते है क्या फायदा कोई ताल्लुकात बताने में है

अब दिल टूटे या पैमाने , ये दौर ही यही है
अब टूटे है फिर न जुड़ेंगे , मज़ा नहीं अब किसी हर्जाने में है

महफ़िल में अपने भी पराये भी , दोस्त भी दुश्मन भी
चुप ही बैठते है क्या मज़ा किसी को सताने में है

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