जग त्याग उड़ जाना मुझको न भाता

वेदना-वर्षा बेरोक घोंसलें में है आती
बोल पंछी की अंधेरे में मिलती जाती
सूने-सूने घोंसलें में अकेले हूँ जीता
जग त्याग उड़ जाना मुझको न भाता

वो दिन न जाने कबके ही बीत गये
संग के दृश्य आँखों में तस्वीर हो गये
तू हर क्षण संग ही अभिनय है करता
परछाई क्यों है? समक्ष प्रकट न होता
हे कवि! चारों ओर तू क्या है गाता?
जग त्याग उड़ जाना मुझको न भाता

हरी-हरी लहलहाती फसल मध्य मैं था
शरद ऋतु की ठिठुरता में भी था सींचा
नभ के नीचे ही मेरा सम्पूर्ण खेत किन्तु
तू जाने किधर से घुसा खेती चरने हेतु
कितना ही सभ्य पशु जैसे तू चरने लगा
बिजली कौंधी मन में, लूटने जैसा लगा
हे दानी! तेरी धरा, वायु, नभ, जल पर
मैंने तुझे ही किनारे कर दिया थल पर
स्मरण कर छाती रोती, क्षण न बीतता
जग त्याग उड़ जाना मुझको न भाता

बिछरन पश्चात भी है आस लगी
प्रभु की नौका कभी उतर आयेगी
मेरे आँख-आँसुओं के सागर में
मेरे सूने-सूने मन के नगर में
हे सन्यासी! बांसुरी पर गीत गाते हुए
मेरे गृह-द्वार आ, दिन शेष न रहें
तेरे सोने के पाँव नयन-जल से धुला
सम्पूर्ण फसल-गृह त्यागने दे, न रुला
अपना बोझा ढोने वाला ही बना ले
जो भी तूने जुटाया है, कण-अंश ही दे
अपने जोगी-जग में नौका-पतवार बना
मेरा मान-सम्मान धूलि में, हे नाविक आ!
प्रतिक्षण प्राण मर रहा, पूर्ण न मर पाता
जग त्याग उड़ जाना मुझको न भाता

– नीरज सारंग

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