उस सुन्दर काली लङकी की सेल्फी -संजय कुमार शांडिल्य

ब्राजील की उस काली लङकी की सेल्फी में मुस्कुराहट जैसे पराना नदी काले बादलों के बीच से बहती है

समुद्र की तरह अपने इस चेहरे का नमक छलकाती
वह मौसम को शाम की बारिशों से भर रही है
वह इन नयी बहारों में अपने श्रम से लहलहाते केले
के बगानों से यूँ ही बाहर आई होगी
इस जर्जर चर्च के ठीक सामने तक कयी शताब्दियों को पीछे छोङते हुए ।

धुआँ-धुआँ है चर्च,सूनी-सूनी है ऐशल पुरानी उमस से
भरा हुआ एक बासी पुर्तगाली वास्तु का भग्नावशेष
आज इसकी पलपिट के आगे एक मद्धम गूँज है, पादरी भी नहीं
कहीँ सोया होगा किसी पुरानी वासना के उजले दिवास्वप्न की कहवे जैसी नींद में ।

यह सेल्फी इस जर्जर चर्च के सामने उतनी निर्वसना है
जितनी कि क्रान्ति और यह निर्वसन उस काली सुन्दर लङकी का जैसे विषुवतीय धूप समय को म्लान करता
यह निर्वसन उसकी रूह से उतरा है उसकी देह में
और यह निर्वसन उसका संभोग के लिए उपलब्ध नहीं है ।

उसका लोकगीत आज उसकी स्कर्ट की जेब से बाहर
झाँकता रूमाल है
उतना ही दिलफरेब और मांसल जितना वह संगीत
उसके फैले हुए बाजुओं से छलक रहा है उसके पसीने सा ।

उसके इस नये लोकगीत की नई संबा धुन होगी
अभी इस सेल्फी से निकलकर वह इस नई धुन पर
नाचने लगेगी
सधे हुए कदम रखते हुए उस पृथ्वी पर जो अभी-अभी जन्मी है ।

उसका राजकुमार उसके पसीने की गंध से प्यार करेगा
तुम माँगना चाहो उसे तो माँगो उसकी इस छलकती हुई सेल्फी से
इस झरते हुए पीले चर्च के ठीक सामने
दो पुर्तगाली नस्लों के लङकी और लङके के बीच
किसी पादरी की पुरानी आवाज में डूबते हुए पङोसियों के घर हैं ।

इस सेल्फी में जो बादलों के रंग की, बगानों की लिबास में
संबा की नई धुन पर
नाच रही घुँघराले बालों वाली पराना की बहती हुईं मुस्कुराहट पहने
जो यह सुन्दर सी काली लङकी खङी है
इसके पीछे हवाओं में हिलता हुआ एक बरसों पुराना जर्जर चर्च है
इसके आगे घुटनों पर खङा शताब्दियों का पराजित इतिहास है ।

यह सुन्दर सी लङकी अपना काला रंग पीछे छोड़ आई है
यह कुछ देर यहाँ सिर उठाये खङा रहेगी
और पराना की बहती मुस्कुराहटों के हरे बगानों में लौट जाएगी

मैं इस सेल्फी को अपनी पहली लाइक भेज रहा हूँ
मेरे आसपास दुनिया ऐसे ही बदल जाए
मुझे बहती हुई नदियों पर भरोसा है गरचे वे ऐसी ही बहती रहें ।

2 Comments

  1. अनिल प्रसाद 31/10/2014
    • Sanjay Kumar Shandilya 31/10/2014

Leave a Reply