घर से निकलते ही

घर से निकलते ही
अयोध्या का जिक्र होता है,
हिन्दू आपको मुसलमां
आपको खफ़ा होता है।
जो शाह तरजीह दे रहे हैं
इन गुनेहगारों को,
क्या सुप्रीम कोर्ट
उन पर भी खफ़ा होता है?
गर बाबर जीता तो
रावण भी खुदा है यारो,
देखिए मर्यादा पुरुषोत्तम
कब गिरफ्तार होता है?
सियासत-ए-शाह ही
अफ़ई-ए-आस्तीन नहीं है,
गिरीबां अपना भी
खूं से तरबतर होता है।
बयाने-सदाकत भी
जुर्म है बदखू है मुल्क में,
बाजार-ए-मिल्लत
तमाम तन्त्र मालामाल होता है।
मेरी कलम का इकराम
तुम करो न करो दोस्तो,
अपने खन्जर अपना ही
गिरीबां हलाल होता है।
दरम्यां फ़साद यूँ भी
अपना सिर रखा है मैंने,
देखिए खुदा ओ राम का हुक्म
कैसे बयां होता है?
‘मुकेश जी’मगर मैं
रवायते-हिन्दोस्तां न छोड़ूंगा,
अब चाहे मेरे मुल्क मेरा सर
गर्दन से जुदा होता है।

शब्दार्थ-
1-अफ़ई-ए-आस्तीन/आस्तीन के साँप
2-बयाने-सदाकत/सच्चाई की चर्चा
3-बाजार-ए-मिल्लत/साम्प्रदायिक बाजार
4-रवायते-हिन्दोस्तां/भारतीय संस्क्रति

मुकेश शर्मा
09910198419

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