आज जाने क्यूँ, बहुत घर याद आ रहा है

आज जाने क्यूँ बहुत घर याद आ रहा है,
वो गलियां, बाज़ार, मैदान याद आ रहा है।

किलकारियों की गूँज तो अभी भी होगी वहां,
कुछ रोते, सुबकते, कुछ ठिठोली करते बच्चे भी होंगे,
कुछ माँ भी होंगी देखते अपने नौनिहालों को,
अपने कल को, अपने बुढापे के सहारों को।

कुछ रेहड़ी वाले भी होंगे, बेचते खिलौने और मिश्री,
कुछ वृद्ध करते चहलकदमी, कुछ बैठे हुए,
कुछ परिंदे भी होंगे अपनी रोटी की खोज में,
कुछ नौजवान भी होंगे, अपनी मौज में।

इन सब को देखता कोई बीमार भी होगा वहां,
नयी उमंग, नया उल्लास उसमे आ रहा होगा इनसे,
फिर उसकी तबियत हरी होने लगी होगी,
अब उसकी इच्छा भी चहलकदमी की होने लगी होगी।

आज जाने क्यूँ बहुत घर याद आ रहा है,
वो गलियां, बाज़ार, मैदान याद आ रहा है।

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