आ बैठ चंद घड़ी

आ बैठ चंद घड़ी
आराम कर ले
किश्ती जिन्दगी की
बहक सी रही है,
मुझे दिख रहा है
नदी का उफान भी
जिन्दगी भी तेरी
मुझे दिख रही है।

इन राहों पे साथी
पाने की हसरत तेरी
कहीं का न छोड़ेगी
ये किस्मत तेरी,
जिन्दगी तन्हा अच्छी
गर बेतरतीब निकले
इसे प्रेमी न समझ
चाहता है अस्मत तेरी।

यूँ भी चाहने से किसी को
मंजिल मिली है
यदि मिलती तो चाहता
मकां उसका,
राधे-क्रष्ण की प्यारी
युगलबंदी होती
रुक्मणी का प्रसाद
सुदामा की भक्ति होती।

क्या करेगी ये बता
मेरी जीवन-नाव पर
मलहम लगा या नमक
आज मेरे घाव पर,
उफ्फ न करूँ जुबान से
है तेरा अरमान क्या
चल डुबो दे धार में
या बिठा दे नाव पर।

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