कभी-कभी सोचता हूँ

कभी-कभी सोचता हूँ
क्या चाहूँ इस दौर में,
बेईमानी,भ्रष्टाचार के
सिवा कुछ दिखता ही नहीं।
आप भी अपनी नजर
उठाकर देखिए श्रीमान,
नजर उठाने वाला कोई
शख्स दिखता ही नहीं।
हर नजर झुक रही है
गज सूंड की तरह,
गज से कद वाला कदावर
कोई दिखता ही नहीं।
मनुष्य निज स्वार्थ में
इतना लिप्त हो गया है कि-
स्वार्थ उठाकर देखिए तो
कुछ दिखता ही नहीं।
हसीनाओं को चाहने वाले
बहुत मिल जाएँगे मगर,
उनके दुःख भी उठाए
वो शख्स दिखता ही नहीं।
किसे दिखा रही हो मैडम
अपने हुस्न का जादू,
बिना जवानी हमें हुस्न में
कुछ दिखता ही नहीं।

मुकेश शर्मा
09910198419

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