आओ चले मिलकर …..

आओ चले मिलकर कुछ ऐसा कर जाए
बेरूखी के आलम में जब बेरंग जिंदगानी हो
कर के आबपाशी अपने अश्क-ऐ-उल्फत से
उजड़े चमन को महकता गुलशन कर जाए II १ II

जब तन्हा हो कोई राही जिंदगी के सफर में
हो मुखातिब इस तरह हम उन से,
यू लगे के नाता बहुत पुराना है उन से,
दे पल भर की ख़ुशी उनके जीवन को
शुष्क कलि से खिलता गुलाब कर जाए II २ II

रोता है क्यूँ कोई जिंदगी जीने के लिए
तरसता क्यों कोई दो जून रोटी के लिए
चलो मिलकर प्रेम का एक ऐसा जहाँ बसाये
मिटा जाए दूरिया इंसानो के दरमियान
इस दुनिया को हम जन्नत में बदल जाए II ३ II

लुटते रहे है हम सदा से धर्म नाम पर
मरते रहे खुद ही एक दूजे को मारकर
आओ कुछ ज्ञान का ऐसा दीप जलाये
मिटे अन्धकार, दिलों में हो उजियारा,
ऐसा जगत में शिक्षा का परचम लहराए II ४ II

रहते है खफा-खफा, अपने ही अपनों से जो
साथ बैठे पर लगते है,जुदा हो जन्मो से वो
करे कुछ ऐसा जतन,भाई-भाई से न टकराये
न रहे द्वेष भाव दिलो में, प्रेम का अलख जगाये II ५ II

आओ चले मिलकर कुछ ऐसा कर जाए
बहकी-बहकी, भटकी-भटकी दुनिया को
संग-संग मिलकर जीने की कला सिखाये
देके छींटे प्रेम रस के,सूखे दिलो को हर्षाये
आओ चले मिलकर कुछ ऐसा कर जाए II ६ II

डी. के. निवातियाँ
***************

2 Comments

  1. shakirkhansaifi@gmail.com 01/11/2014
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/03/2015

Leave a Reply