ट्रेन से मैट्रो का सफ़र

ट्रेन का सफ़र भी क्या सफ़र था
अजनबी अपनापन दिखाता था
उदास मन खिल जाता था
चिंता दिमाग से निकल जाती थी
थोड़ी देर के लिए घर की याद नहीं आती थी ll

नई शर्ट पहनने पर कोई धीरे से चुटकी भर जाता था
तो कोई सीट ना मिलने पर गोद में बैठ जाता था
मजाक करने में उम्र आड़े नहीं आती थी
थोड़ी देर के लिए घर की याद नहीं आती थी ll

कोई किसी का टिफिन निकल कर खा जाता था
कोई प्यास लगने पर अपना पानी पिलाता था
किसी को कोई चोट भी लग जाती थी
तो भी थोड़ी देर के लिए घर की याद नहीं आती थी ll

स्टेशन पर सब एक दूसरे का इंतजार करते थे
किसी के ना आने पर एक दूसरे को फोन करते थे
ट्रेन में लेडीज़ भी मधुर वाणी में भजन सुनाती थी
थोड़ी देर के लिए घर की याद नहीं आती थी ll

वहीं मैट्रो में भीड़ होते हुए भी सुनापन छाता है
कोई किसी से बोलना नहीं चाहता है
सीट पर जगह ना देने के लिए सर झुकाकर बैठ जाते है
सामने बुज़ुर्ग को खड़े देखकर भी खड़े नहीं हो पाते है ll

कान में मोबाइल की तार लगाकर गाने सुने जाते है
किसी को किसी से कोई मतलब नहीं होता
नकली हँसी हँसते हुए भी सब परेशान नज़र आते है
मैट्रो में अकेलापन देखकर याद बहुत सताती है
ना चाहते हुए भी यहाँ पर घर की याद बहुत आती है ll

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