हुस्न

हुस्न की वह हूर थी जो कहर ढाह कर चली गयीं
दिल की बातें कहते उनको पर मुस्कुराकर चली गयीं

सहमी सहमी आँखे उनकी पलकें हिलती पत्तों जैसे
आई थीं वो माशुम बनकर और शहर हिलाकर चली गयीं

हर गली में थी बस चर्चा उन्ही की कोई शोख नयी आयीं हैं
महफिल मे आयीं प्यारी अदा से और छम छमा कर चली गयीं

सभी हो गए थे दीवाने उनके बातें करने को ढूंढते बहाने
सबको उन्होंने घायल कर के और नजर बचाकर चली गयीं

कहाँ से आयीं कैसे आयीं नाम पता जानता न कोई
हवा बनके वो आयीं कुछ ऐसे और खुश्बु उडाकर चली गयीं

याद करते है सब आह भर भर के जैसे कोई मीठा ख्वाब हो
सब हाथ मलते रह गए वह बिमार बनाकर चली गयीं
२८-१०-२०१४

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