“हनुमत शरण”

हो निरुपाय वीरवर बैठे,
सिन्धु हिलोरें लेता था।
“जाने दूंगा नहीं आज मैं”
हो मदांध यह कहता था।

जाम्बवंत, नल, नील, केसरी,
अंगदादि हनुमान खड़े।
लंका उधर, वहां माँ सीता,
ये सब हैं निरुपाय पड़े।

जाम्बवंत प्रखर सुज्ञानी
हनूमान की ओर चले।
हम दुर्बल, तुम बल के सागर,
क्यों हो मलिन मुख लिये हुए?

याद करो अपने उस बल को,
बाल्यकाल रवि भक्ष लिया।
हो अभिमत्त इन्द्र जब आये,
उनका भी मद चूर्ण किया।

आज उसी बल को पहचानो,
रौद्र रूप फिर धारो अब।
सागर पार लंक तुम जाकर,
बांधव हमें उबारो अब।

सीता माता की सुधि लाओ,
काज राम के सारो तुम।
जीवन है सबका संकट में,
हे कपि, हमें उबारो तुम।

याद किया बल हनूमान ने,
श्री राम को नमन किया।
उठा वीर तीनों लोकों को
गर्जन से भयभीत किया।

जिस पर्वत पर चरण पड़े वह
सीधा ही पाताल गया।
मुनिगण हर्षे, हरिगण हर्षे,
करने सागर पार गया।

देवगणों ने सोचा मन में,
वानर का बल देखें हम।
सापों की माता सुरसा को
कहा, “परीक्षा ले लो तुम।”

“देवगणों ने भेज मुझको,
मैं हूँ क्लांत, क्षुधित नारी।
मेरी क्षुधा शांत कर दे तू,
कहाँ जा रहा तनुधारी?”

“रघुपति की सेवा में हूँ मैं,
माँ का पता लगाना है।
सीता माँ की सुधि लाऊँ फिर,
खा लेना यदि खाना है।”

सुरसा नहीं हटी आगे से,
कपि ने रूप बढ़ाया।
सुरसा ने भी मुख फैलाया,
खूब कौतुहल छाया।

सुरसा हुई अष्ट-योजन
तब कपि ने सोलह दिखलाये।
बत्तीस योजन जब बढ़ आई,
कपि चौसठ हो धाये।

सुरसा ने तब सौ योजन का
भीषण मुख फैलाया।
अति लघु रूप लिया हनुमत ने,
आनन् में हो आया।

बाहर आकर बोले हनुमत,
“माता अब जाने दे।
हठ तेरा तो पूर्ण किया,
अब सीता सुधि लाने दे।”

“बल ही नहीं, बुद्धि भी तुममें,
तुम सब काज करोगे।
आसिष तुम्हें ह्रदय से देती,
विजयी सदा रहोगे।”

आसिष दे सुरसा गयी
पहुँच गयी निज धाम।
हनुमत इधर बढ़े आगे को,
अभी कहाँ विश्राम।

सागर पार किया कपिवर ने,
दिखी दूर से लंका।
अति सुद्रढ़ कंचन की नगरी,
रहते खल निश्शंका।

बाग, सरोवर, पुष्प-वाटिका,
कंचन भवन सुहायें।
चंचल, स्निग्ध, रक्ताभ नारियां,
मुनिजन को भरमायें।

कहीं अखाड़े सजे हुए हैं,
वीर गर्जना करते।
मल्लयुद्ध हो रहा कहीं पर,
कहीं शस्त्र भी खनकें।

अति लघु रूप लिया हनुमत ने,
भीतर कदम बढ़ाया।
खड़ी लंकिनी, द्वार-पालिका,
“कह क्या करने आया?”

मुष्टि-प्रहार किया तब कपि ने,
गिरी भूमि पर लंका,
हुई क्लान्त, भयभीत, पराजित,
बोली वचन सशंका।

रावण जब विधि से वर पाया,
पायी अजर-अमरता।
कहा ब्रम्ह ने मुझे बुलाकर,
“ध्यान धरो हे लंका।

हॊओ विकल जब कपि प्रहार से,
असुर अंत तब जानो।
रामभक्त तुझको तारेंगे,
विधि का निर्णय मानो।”

“पुन्य किये कुछ संचित मैंने,
दरस तुम्हारा पाया।
हे बजरंगी अन्दर जाओ,
काटो सारी माया।”

किया प्रणाम राम-चरणों में,
लंका में पग डाला।
सीता की सुधि लेने आये,
अति लघु रूप विचारा।

देखा रावण के मंदिर को,
अति आश्चर्य समाया।
रावण के महलों में देखा,
सीता-सुधि ना पाया।

हरि-मंदिर देखा एक घर में,
घोर कौतुहल छाया।
“इस निसिचर-नगरी में रहने,
कौन महात्मा आया?”

हनूमान जी विप्र रूप में
यह विचार कर रहे खड़े।
उठे विभीषण उसी काल,
स्वर ‘राम-राम’ के कान पड़े।

“रावण-अनुज विभीषण हूँ मैं,
निसिचर कुल में जन्म लिया।
घोर पातकी तन पाकर भी,
राम चरण रत धन्य हुआ।”

तब हनुमत ने कहा, “विभीषण,
तुमने निज कुल तारा।
माँ सीता का पता बताओ,
बहुत दूर से आया।”

“रावण की प्यारी फुलवारी,
नाम अशोक-वाटिका,
सीता माँ बंदी हैं उसमें,
दूर करो दुःख भ्राता।”

मांगी विदा विभीषण से तब
पुनः राम को नमन किया।
ध्येय मिला पथ की क्या चिंता,
हो उत्साही वीर चला।

वन अशोक सीता माँ बैठीं
धरणी को देखें अविराम।
दुःख से मलिन, श्रांत, विह्वल तन,
जिनके स्वामी खुद सुखधाम।

गौरवर्ण रक्ताभ कमलमुख
अति दुःख से हो मलिन रहा।
पति-वियोग में हर क्षण जैसे
वर्ष-समान व्यतीत हुआ।

करुणा स्वयं प्रकट हो आयी,
पीड़ा स्वयं विलाप करे।
हनुमत ह्रदय दुखित हो आया,
आँखों से झर अश्रु रहे।

तभी दशानन आया मद में,
कपि झुरमुट की ओट हुए।
पटरानी मंदोदरी संग में,
कहा सिया से, “सुनो प्रिये।

बनो लंक की तुम पटरानी,
चेरी हों मंदोदरी रानी।
स्वयं रहूँ मैं दास तुम्हारा,
तुम पर हूँ निज हिय मैं हारा।”

त्रण की ओट हुईं बैदेही,
“पति मेरे मम परम सनेही।
आयेंगे लेने मुझको हरी,
दुष्ट, अधोगति होगी तेरी।”

किया दर्प सब चूर दुष्ट का,
राम-चरण अनुराग दिखाया।
हो उन्मत्त, मदांध, दुष्ट ने,
सिय की और कृपाण उठाया।

मंदोदरी ने रोका पति को,
अनुचित-उचित मर्म समझाया।
किया दुष्ट ने अट्टहास तब,
निसिचरियों को पास बुलाया।

“तुम सब मिल माया फैलाओ।”
यह कह रावण गया भवन।
यहाँ घोर कौतुहल होता,
सीता माँ बैठीं उपवन।

एक निसिचरी त्रिजिटा भी थी,
राम-चरण की दासी।
उसने स्वप्न कहा निज सबसे,
“क्या कर रहीं अभागी।”

“अंत राक्षसों का अब आया,
रघुपति पापी मारेंगे।
कर्म सुफल कर लो यदि अपने,
निश्चित तुम्हें उबारेंगे।”

हुईं भीरु सब जातुधानियाँ
निज-निज गृह की ओर चलीं।
सिय बोलीं त्रिजिटा से, “माता,
मुझ पर विपति गंभीर पड़ी।”

“मातु कहीं से अग्नि दिला दो,
निज संकट मैं काटूं तब।
यह शरीर बंदी है तो क्या?
आत्मा पति से मिल ले अब।”

“पाप करुँगी मैं यह कैसे?”
त्रिजिटा मन में अकुलाई।
“घोर रात्रि में अगन कहाँ प्रिय?”
ढाढ़स दे घर को आयी।

सिय बोलीं अशोक तरुवर से,
“तुम अशोक हो शोक हरो।
नूतन किसलय हैं अग्नि-सम;
चिता यहाँ प्रज्वलित करो।”

उचित समय जाना हनुमत ने,
मुंदरी भू पर डाल दिया।
ज्यों अशोक ने अग्नि भेंट की,
हर्षित सिय ने ग्रहण किया।

हुईं चकित, मुंदरी पहचानी,
राम नाम अंकित उस पर।
हर्षित, चिंतित, हुईं विकल सिय,
कपि तरु से तब गए उतर।

“रामदूत मैं मातु जानकी,
हनूमान कहलाता हूँ।
खोज तुम्हारी करने आया,
मुंदरी राम से लाया हूँ।”

“यदि श्रीराम सूचना पाते,
नहीं इतना विलम्ब माँ करते।
यदि राघव की आज्ञा पाऊँ,
मैं अविलम्ब तुम्हें ले जाऊं।”

माँ ने निज सुत को पहचाना,
दिया असीस राम-प्रिय जाना।
“अजर-अमर, गुणवान बनो सुत,
राम भक्तिरस गंग बहाना।”

“हुआ कृतज्ञ आज मैं माता,
तव आसिष मुझको सुखदाता।
दो आज्ञा वन में फल खाऊं,
अपनी क्षुधा शांत कर आऊं।”

“बुद्धि-बल में निपुण हो,
सुत मधुबन में जाओ।
रघुनन्दन की कृपा से,
पुत्र मधुर फल खाओ।”

किया प्रणाम मातु-चरणों में,
वन की ओर कपीश गया।
फल खाए कुछ, फिर तरु तोड़े,
क्षण में वाटिका ध्वंस किया।

द्वारपाल रक्षा को धाये,
कुछ मारे, कुछ मार भगाये।
तब रावण ने भेजे योद्धा,
हनुमत-बल का पार न पाये।

भेजा राजकुमार अक्ष को,
कपि ने पौरुष दिखलाया।
मुष्टि-प्रहार किया हनुमत ने,
पल में यमपुर पहुंचाया।

भ्रात-घात का समाचार सुन,
हुआ इन्द्रजित परम कुपित।
महाबली रावण-सुत जिससे,
इन्द्रराज भी थे कम्पित।

गर्जन किया वाटिका जाकर,
बजरंगी को ललकारा।
बजरंगी सन्मुख हो धाये,
रथ-सारथि क्षण में मारा।

हुआ कुपित तब दशकंधर-सुत,
क्षण में माया फैलाई।
मायापति रक्षक हनुमत के,
माया काम न कुछ आयी।

ब्रह्म-अस्त्र साधा तब खल ने,
कपि ने विधि को नमन किया।
ब्रह्मा की महिमा की खातिर,
मूर्छित खुद कपिराज हुआ।

नागपाश डाला तब खल ने,
कपिवर को ले महल चला।
बंदी हनुमत को ले जा कर,
पितु के सन्मुख नमन किया।

रावण बोला, “सच कह वानर
किस कुल में है जन्म लिया?
नाम, ठिकाना क्या है तेरा?
किसके बल यह ध्वंस किया?”

“पिता केसरी, मातु अंजना,
हनूमान कहलाता हूँ।
किसके बल यह ध्वंस किया है,
अब मैं वह बतलाता हूँ।

जिसके बल ब्रह्माण्ड बना है,
जिसके बल यह फैली माया।
जिसके बल ब्रह्मा, हरि, शंभू
ने सारा जीवन उपजाया।

जिसके बल तूने वर पाया,
वर पाकर कैलाश उठाया।
जिसके बल ‘बाली’ ने तुझको
कांख में धरकर त्रास दिलाया।

जिनके बल है उगता सूरज,
जिनके बल हैं धुप व छाया।
उन्हीं ‘राम’ का दूत मैं हनुमत,
जिनकी पत्नी तू हर लाया।”

सुनकर कपि के वचन दशानन,
अति क्रोधित हो खिन्न हुआ।
“जो राक्षस इसका सिर काटे,
राक्षस-कुल में धन्य हुआ।”

यह सुनकर धाये रजनीचर,
खड्ग हवा में लहराये।
तभी विभीषण आगे आये,
योद्धाओं को ठहराये।

हाथ जोड़कर ज्येष्ठ भ्रात को,
सादर पहले नमन किया।
“राजनीती में दूत न मारें।”
हाथ जोड़कर पुनः कहा।

“जान छोड़ देता हूँ इसकी।”
हंसकर बोला दशकंधर।
“किन्तु न यूँ ही जाने पाए,
अंग-भंग भेजो बन्दर।”

“वानर-कुल में जन्म लिया है,
पूंछ बहुत प्यारी इसको।
इसी पूंछ में आग लगा दो,
कष्ट बहुत होगा इसको।”

पूंछ प्रज्वलित देखि कपि ने,
अति लघु रूप तुरंत लिया।
कूद चढ़े कंचन महलों पर,
सिंहनाद घनघोर किया।

लगे जलाने लंका नगरी,
कंचन महल प्रदीप्त किये।
एक विभीषण का घर छोड़ा,
अन्य भवन सब दहन किये।

काराग्रह में बंदी शनि को,
कपि ने जाकर मुक्त किया।
शनि ने ऐसी दृष्टि फिरायी,
स्वर्ण-धातु को लौह किया।

तत्पश्चात सिन्धु में कूदे,
पूंछ बुझाकर वापस आये।
सीता माँ से आज्ञा लेने,
पुनः अशोक वाटिका आये।

“मातु निशानी कोई दे दो,
रघुनन्दन को दिखलाऊँ।
मातु तुम्हारी खबर शीघ्र मैं,
रघुनन्दन तक पहुचाऊं।”

चूड़ामणि सिय ने दी कपि को,
“पुत्र इसे तुम ले जाओ।
मेरी व्यथा बताना हरि को,
उनको जल्दी ले आओ।”

धैर्य दिया माता सीता को,
आज्ञा ले प्रस्थान किया।
सीता माँ का आसिष पाकर,
हो प्रसन्नचित वीर चला।

रघुनन्दन के सन्मुख आकर,
सब कपियों ने नमन किया।
हनूमान की करनी सुनकर,
रघुवर ने आशीष दिया।

“हे कपि ये उपकार तुम्हारा,
कैसे उऋण करें हम भ्राता।”
कह प्रभु ने कपि ह्रदय लगाया,
अपने परम निकट बैठाया।

हनुमत नेत्र सजल हो आये,
बही अश्रु की अविरल धारा।
“स्वामी काम आपके आऊं,
जन्म सुफल हो जाये मेरा।”

कहा राम ने कपिनरेश से,
युद्ध-वेश सब धारो अब।
वानर-सेना को आज्ञा दो,
करें चढ़ाई लंका पर।

सब प्रकार सज्जित हो योद्धा,
शंखनाद कर निकल पड़े।
अति निर्भीक भालु कपि सारे,
राम-नाम की ओट चले।

श्री रघुनन्दन के गुण गाते,
सागर तट पर कपिगण आये।
“सागर हमें रास्ता देगा।”
रामचंद्र यह कह मुस्काये।

उधर राक्षसों की नगरी में,
तबसे गहन विषाद समाया।
जबसे एक अकेला वानर,
सारा नगर दहन कर आया।

एक दिन अनुज विभीषण ने,
अग्रज रावण को यह समझाया।
“सीता माता वापस कर दो,
क्यों तुमने है वैर बढ़ाया?”

“राम नहीं साधारण नर हैं,
मनुज नहीं अवतारी हैं।
क्षमा मांग लो जाकर प्रभु से,
नहीं काल अब भारी है।”

सुने भ्रात के वचन दशानन,
अति क्रोधित हो खिन्न हुआ।
चरण-प्रहार किया मस्तक पर,
“जा जिनका तू दास हुआ।”

दुखित विभीषण चला सिसकता,
राम-चरण की ओर चला।
सिन्धु पार आया इस तट पर,
राम शरण के हेतु बढ़ा।

रामचंद्र को देखा उसने,
नेत्र सजल हो आये।
पुलकित हुआ शरीर प्रेमवश,
अश्रु न रुकने पायें।

“कानों से यश सुन आया प्रभु,
पार लगाओ बेड़ा।
शरण आपकी आया हूँ प्रभु,
दो चरणों में डेरा।”

“हो द्रोही तीनों लोकों का,
शरणागत यदि मेरी आये।
छोड़े पापकर्म सब पिछले,
सदा अभयगति मुझसे पाये।”

यह कहकर श्री रामचंद्र ने,
शरणागत का मान किया।
राजतिलक कर, मित्र विभीषण
को लंका का राज दिया।

मांग रहे प्रभु सागर से पथ,
सागर विनय न सुनता था।
रघुनन्दन क्रोधित हो बोले,
“भय बिन प्रेम न रमता है।”

“लक्ष्मण धनुष-बाण ले आओ,
सागर-जल को सोखुं अब।
विनय समाप्त हो चुकी, इसको
क्षत्रिय बल दिखला दूं अब।”

यह सुनकर सागर घबराया,
तुरत राम की शरण हुआ।
अपनी जड़ता पर लज्जित हो,
सादर अनुनय-विनय किया।

“नाथ नील-नल दो कपि भाई,
ऋषिवर से हैं आसिष पाये।
उनके फेंके पत्थर जल में,
प्रभु-प्रताप से हैं उतराते।”

“नाथ नील-नल को आसिष दो,
रामसेतु निर्माण करायें।
जिस पर चढ़कर सारी सेना,
निसिचर नगरी लंका जाये।”

युक्ति सुझाकर, आसिष देकर,
प्रभु आज्ञा ले सिन्धु गया।
‘प्रभु’ आसिष से, ‘तुलसी’ कृपा से,
इस जड़ ने वृत्तान्त कहा।

“सकल सुमंगल दायक,
रघुनायक गुनगान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव-
सिन्धु बिना जलजान।”

– हिमांशु

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