“कोई आया है”

इस दिल में थी कुछ राख बची,
क्यों हवा चली? ये आग बढ़ी?
क्यों ठन्डे होते अरमां को फिर से इसने सुलगाया है?
क्या शायद कोई आया है?

मंथर-मंथर जीवन बढ़ता, गति हिय की रूकती जाती थी।
जीवन के इन स्मृति-प्रश्ठों पर, धूली भी जमती जाती थी।
सहसा आकर इस कम्पन ने क्यों धड़कन को भड़काया है?
फिर शायद कोई आया है?

कविता भी कहीं उनींदी सी, लेखनी कहीं थी बंद पड़ी।
अहसास, जतन, चिंतन व सृजन, थी स्वयं चेतना मरी हुई।
इस जीवित-शव में फिर कोई नव-जीवन देने आया है।
फिर शायद कोई आया है?

क्यों फिर आएगा अब कोई? वो घड़ी कभी की बीत गयी।
क्यों सपना आएगा कोई जब नींद ही मेरी टूट गयी?
सच तो केवल इतना ही है, तू फिर से यही भरोसा रख।
अब कोई कभी नहीं आएगा।

– हिमांशु

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