“द्वेष”

हर तरफ चीख सी उठती है,
हर ओर उदासी छाई है।
हर तरफ़ शोर है मातम का,
हर जगह प्रलय सी आई है।

अन्दर है एक तूफ़ान उठा,
जो नहीं बयां हो पाता है।
जब चाहूं उसको उगलूँ मैं
तो गला ख़ुश्क हो जाता है।

हर तरफ़ खिंची हैं तलवारें,
नफ़रत की और खुदगर्ज़ी की।
मानो दूजे में खून नहीं
पानी ही दौड़े जाता है।

हैं जिस्म शांत इस दंगल में,
बस दिल ही लड़ते दिखते हैं।
दिल ही घायल, दिल ही मृत हैं,
दिल से ही खून निकलता है।

जिस्मों के दंगल क्या जानें,
गहरी चोटें क्या होती हैं।
दिल पर तो छोटी-सी खरोंच,
नासूर पुराना होता है।

नफ़रत की आंधी आई है,
ये तुझे उड़ा ले जायेगी।
तू कब तक घर में बैठेगा,
क्यों बाहर नहीं निकलता है।

हर तरफ़ प्रलय सी आई है,
सब द्वेषमग्न हो जायेगा।
छुपकर घर में जो बैठेगा,
वो जिंदा तो रह जायेगा।

इस घोर द्वेष की आंधी में
अब सांस भी लेना मुश्किल है,
ईश्वर पर सिर्फ़ भरोसा रख
कल नया सूर्य उग जायेगा।

– हिमांशु

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