“युगपुरुष”

इंसान चले जाते हैं,
पर नाम छोड़ जाते हैं,
ग़र काम भले हों तो बन्दे,
सदियों तक याद आते हैं I

मिटटी के ही वो पुतले,
इतिहास बदल जाते हैं,
वो दुनिया नयी बनाकर,
नयी किरन दिखा जाते हैं I

न रूप, रंग, कुल, काया
सम्मान यहाँ पाते हैं,
ग़र काम भले हों तो बन्दे,
सदियों तक याद आते हैं I

हैं अति निकृष्ट वो प्राणी,
जो बस खुद ही खाते हैं I
सौ बार धन्य उनको जो
जनहित पर मर जाते हैं I

हर युग में वो लोगों को
सही राह दिखा जाते हैं I
ग़र काम भले हों तो बन्दे,
सदियों तक याद आते हैं I

वो नयी सुबह के सूरज,
सब तिमिर मिटा जाते हैं I
उज्जवल किरणों से जग को
आलोकित कर जाते हैं I

वो अपने ज्ञानशरों से
अज्ञान भेद जाते हैं I
ग़र काम भले हों तो बन्दे,
सदियों तक याद आते हैं I

वो तो ‘हिमांशु’ के जैसे,
शीतलता दे जाते हैं I
इस जलती हुई धरा की
कुछ तपन बुझा जाते हैं I

विधु के सामान ही वो तो
जन-मानस को भाते हैं I
ग़र काम भले हों तो बन्दे,
सदियों तक याद आते हैं I

अपनी लेखनी उठाये
हम लिखते रहे प्रलय तक,
उनके गुण फिर भी इतने
हम नहीं बता सकते हैं I

उनको शत बार नमन कर,
हम बस यह ही गाते हैं I
ग़र काम भले हों तो बन्दे,
सदियों तक याद आते हैं I

– हिमांशु

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