कलयुग हमको दे रहा

कलयुग हमको दे रहा
जीवन की रंगीनियां,
सेक्स के बाजार बसि
सल्फास की गोलियाँ।

जल रही है नार क्यूँ
ससुराल की अंगनाई में,
शासन तेल उड़ेलता
प्रशासन रहा दफ़नाई में।

छटपटाता है समाज
न्याय के इंतजार में,
प्रशासन अब बिक रहा
रुपए दस हजार में।

क्यों धरा खामोश अरु
क्यों दहकते हैं अंगार,
आप भी खामोश जब
आपकी जल गई नार।

बदल गया दस्तूर
बदल गई खटिया जिसकी,
लगी न मेंहदी हाथ
बनी वो दुल्हन किसकी?

करते रहे इंतजार यदि
हाथ पर रख हाथ हम,
इंकलाब न आएगा
ना बचेंगे आज हम।

सब्र उसका देखिए
थी भेष पर बारूद,
जिन्दगी की साँस था
सब्र का वजूद।

शहीद की लाश पर
होंसलों के निशान थे,
गन लदी बारूद में
विश्वविजय अरमान थे।

बच न सका बारूद से
संविधान को थामकर,
शासन जिन्दा है यहाँ
प्रशासन को मारकर।

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