अपने आप होना

धरम “नकल राजनिती” है
और राजनिती “नकल धरम”
इंसा के पैदा होते है
अंधी में सकल “करम”

ठाकते रहते देखा देखी
आती नहीं शरम
इंसा वो जो देखते रहता
होता अकल “अरम”

होता है बयान से बाहर
अपने आप होना
कोना कोना खिल जाता है
ज्योतिर्मय एकल “परम”

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर
(९८९००५९५२१)

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