।। दगा पड़ाका ।।

।। दगा पड़ाका ।।

आई दिवाली दगा पड़ाका
उठती डोली दगा पड़ाका
रण की भेरी दगा पड़ाका
खोखला होकर दगा पड़ाका
फिर तो यही पड़ाका ।।
कैसे दगा पड़ाका ।।1।।

आसपास तक दगा पड़ाका
फुस हो जाता दगा पड़ाका
रंग –बिरंगा दगा पड़ाका
जलते जलते दगा पड़ाका
शायद यही पड़ाका ।।
हा हा यही पड़ाका ।। 2।।

नही नही यह दिग्दर्शक है
कभी नही यह निरर्थक है
सफलता का प्रदर्शक है
भावों का यह आकर्षक है
सबने जिसको ताका ।।
फिर क्यों दगा पड़ाका ।।3।।

करना क्या है इसका परिचय
कर्तव्यों का करता संचय
सदा इसी कि होती है जय
फिर क्यों बदल गया है आशय
कह तो दिये भड़ाका ।।
कैसे दगा पड़ाका ।।4।।

छोटे छोटे कणों से निर्मित
भोली भाली जिसकी परिमित
मानवता से जो है सीमित
स्नेहिल धागों से बाधित
होता जिसका खाका ।।
कैसे दगा पड़ाका ।। 5।।

यह तो है गर्मी मे छाह
यही सफलता की इक राह
यह समता की एक निगाह
आदर ही बस इसकी चाह
समाजिकता का आँका ।।
कैसे दगा पड़ाका ।। 6।।

अन्धकार का करता नाश
यह जलकर देता प्रकाश
भरता जाता है उल्लास
विफल नही इसका प्रयास
सूचक विजय पताका ।।
सच मे यही पड़ाका ।। 7।।

जिसनें त्यागा जीवन अपना
उसका क्या कोई है सपना
जीवन भर जिसको है तपना
फिर क्या उसके दिल का नपना
क्या डाल रहा है डाका ।।
तब क्यों दगा पड़ाका ।। 8।।

जीवन भर मे जो व्यापक है
उसको निज जीवन का हक है
वही गुरू है अध्यापक है
फिर कैसे इतना घातक है
बाल न करता बांका ।।
यह तो नही पड़ाका ।। 9।।

क्या यह लोगों का उपहास
क्या बच्चों का है परिहास
क्या छण भर का है एहसास
क्या झूठा इसका विश्वास
सत्य को जिसने झाँका ।।
कैसे दगा पड़ाका ।। 10।।

जिसका है अपघर्षण होत
जो ऊर्जा, ऊर्जा का स्रोत
आवेशों से ओतप्रोत
यह न कोई है खद्योत
सीमित नही इलाका ।।
तब क्यों दगा पड़ाका ।। 11।।

जीवन भर जीवन के बाद
नही बन सकेगा अपवाद
दोनो मे कैसा विवाद
व्यर्थ करो न अब संवाद
लेकर कोई ठहाका ।।
कैसे दगा पड़ाका ।। 12।।

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